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Channel: मुक्ताकाश....
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उनके मन कछु और था, बिधना के कछु और....

पूज्य पापाजी (पंडित रामरतन अवस्थी) की पितृ-भूमि की यह मेरी तीसरी यात्रा थी, लेकिन, मुझे लगा कि इस पुण्य-भूमि के दर्शन पहली बार कर रहा हूँ, प्रथमतः इससे परिचित हो रहा हूँ। इसके पहले की मेरी दोनों...

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सच, बौरा डूबन डरा...

एक दिन मुझसे कहा उन्होंने--'आओ मेरे साथ,सागर में उतरो,गहरी भरकर साँस यार, तुम डुबकी मारोक्या जाने सागर कब दे देरंग-बिरंगे रत्न और--एक सच्चा मोती!' चला गया मैं सागर-तट पररहा सोचता बहुत देर तक--साहस...

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सिद्ध हुआ, मैं 'लौहपुरुष'हूँ, 'लोहासिंह'हूँ...

 सिद्ध हुआ, मैं 'लौहपुरुष'हूँ, 'लोहासिंह'हूँ...इस बार पुणे-प्रवास में तबीयत बिगड़ गयी थी। चिकित्सकों से परामर्श और परीक्षणों का दौर चलता रहा। अंततः जुपिटर हाॅस्पिटल, पुणे की दक्ष चिकित्सिका के निर्देश...

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आँख से न आँख लड़ जाये, इस कारण से....

 आँख से न आँख लड़ जाये...इस कारण से...मालूम था, सप्ताह में दो-तीन दिन माली आता है बेटी शैली के घर और देखभाल करता है बागीचे की, लेकिन मैंने कभी देखा नहीं था उसे। बीस दिनों के प्रवास में वह आया न हो, ऐसा...

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चाँद ! मेरे पंजे में आ जा...

 चाँद ! मेरे पंजे में आ जा...ऐ चाँद! मेरे पंजे में आ जा,मेरी मुट्ठी में समा जा।तू मुझ में अपना आलोक बसा जा!ऐ चाँद! मेरे पंजे में आ जा!यह आलोक जो तेरे प्रभा-मण्डल में इठला रहा है, मैं उसे समेटूँअपने...

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यह पथ बंधु है मेरा!...

[भ्रमण-कथा-2]अब तो ठीक-ठीक याद भी नहीं आता कि कितने वर्षों बाद मिला मैं अभिन्न बंधु, आत्मीय स्वजन, कानपुर-प्रवास की मित्रता के हमारे त्रय (ध्रुवेन्द्र-ईश्वर-मैं) की मजबूत कड़ी और मेरी ही राह के...

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जिजीविषा...

कल की ही तो बात थी--हवा में झूमता-इठलाता खड़ा था,मुसाफिरों को छाया देता था,प्रार्थियों को फल--आज निष्प्राण हूँ,नदी के तट पर पड़ा हूँ,अपार जल है, गीली मिट्टी है,मेरी कुछ टहनियाँ जिनमें धँसी हैं,यूँ...

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व्याधियों की व्याध-कथा...

व्याधियाँ होती हैंव्याध-सरीखी,वे दुबककर रहती हैंकिसी शिकारी की तरहमौके की प्रतीक्षा मेंऔर अवसर पाते हीकर देती हैं आक्रमणकिसी कटाहे कुत्ते की तरह...!व्याधियों का व्याधाकभी बहुत क्रूर और निर्मम-साआता है...

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अपार श्रद्धा की पराकाष्ठा पर आजीवन अडिग रहे :पं. रामनारायण मिश्र...(2)सन् 1993-94 में दो मोर्चों पर मैंने भरपूर श्रम किया। यह तो ऐसा ही था, जैसे दो नदियों की तीव्र प्रतिकूल धारा में  एक साथ तैरना हो।...

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अपार श्रद्धा की पराकाष्ठा पर आजीवन अडिग रहे : पं. रामनारायण मिश्र...

एक बुजुर्ग थे। विद्वान् थे। श्वेतकेशी थे। संस्कृतज्ञ थे। कड़क भी थे, भोजपुरीभाषी भी; लेकिन पचहत्तर पार की उम्र में भी शरीर से सक्षम थे। एक दिन पद-यात्रा करते मेरे घर 'मुक्त कुटीर' (कंकड़बाग, पटना) आ...

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शब्द-निःशब्दजब तुम प्रयासपूर्वक निचोड़ते होशब्दों से अतिरिक्त अर्थ,शब्दों को अच्छा नहीं लगता,वे मुँह फुलाकर बैठ जाते हैंऔर करीब बैठे शब्द सेबस, इतना ही कह पाते हैं--'दोस्त ! बहुत दोहन हो रहा है...

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इन्द्रलोक-सा गोवा : जितना भव्य, उतना ही मदहोश...(6)

गोवा-प्रवास के अब दो दिन शेष थे। तीसरे दिन की सुबह हमें पुणे के लिए प्रस्थान करना था। फिर वही राह, वही पहाड़ की चढ़ाई, जहाँ से उतर आये थे हम! आठ घण्टों की वही लंबी डगर...! हमने तय किया कि अब हम...

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इन्द्रलोक-सा गोवा : जितना भव्य, उतना ही मदहोश...(5)

ऊँची पहाड़ी के सर्पिल मार्ग से नीचे उतरते हुए हम समुद्र के किनारे समतल बलुआये मैदान में पहुँचे, जिसकी एक तरफ़ नीला समुद्र था और दूसरी ओर मीठे जल का ताल। अद्भुत सौंदर्य बिखरा हुआ था वहाँ। नारियल और खजूर...

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इन्द्रलोक-सा गोवा : जितना भव्य, उतना ही मदहोश...(4)

पूरी शाम समुद्र-तट पर बीत गयी। अंधकार होते ही तट पर दौड़ती जीप ध्वनि-विस्तारक यंत्र से उद्घोषणा कर रही थी--'पर्यटक समुद्र से बाहर निकल आयें। आज पूरे चाँद की रात है। समंदर की तरंगें असंयमित हो सकती...

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इन्द्रलोक-सा गोवा : जितना भव्य, उतना ही मदहोश...(3)दो दिनों की गोवा की पहली यात्रा मैंने सपरिवार अक्टूबर 2005 में की थी। तब मेरे मेजबान थे मित्रवर ज़हूर भाई! वह मेरे आत्मीय बंधु हैं। उन्होंने और उनकी...

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इन्द्रलोक-सा गोवा : जितना भव्य, उतना ही मदहोश...(2)पर्णकुटी में पहली रात गहरी नींद सोया, लेकिन गहरी नींद को अर्धतंद्रा में बदलती रही एक विचित्र प्रकार के कंपन की अनुभूति। ऐसी प्रतीति होती रही जैसे धरती...

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[एक विस्तृत परिभ्रमण कथा][यात्रा-वृत्तान्त]इन्द्रलोक-सा गोवा : जितना भव्य, उतना ही मदहोश...एक सप्ताह का गोवा-प्रवास अतिशय आनन्ददायी था। पुणे से गोवा आठ घण्टों का निरंतर सफ़र था, चार चक्रवाहिनी से। 4...

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गोआ के सागर-तट से...

मित्र सागर !तुम्हारे विस्तृत भीगे सैंकत श्वेत कणों परमैं छोड़ रहा पद-चिह्न...!सागर के उन्मद ज्वारतुम जब चाहो, मिटा जाना उन्हें...!मैं लौटूंगा युग-युगान्तर बाद कभीजाने कौन-सी मौजों पर होकर सवार।यह...

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जख़्म फिर हरा हो गया...फिल्म 'माॅम'की कलानेत्री श्रीदेवी के हठात् मौन हो जाने से सारा संसार स्तब्ध है और कई ऐंगल से उनकी अचानक हुई मौत पर विचार कर रहा है। टीवी के तमाम चैनलों पर यही चिंता कल से व्यक्त...

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नहीं तो शामत सिर पर आई...!

[एक अनावश्यक कविता]ये जो पत्नियाँ होती हैं न,मुझे लगता है,कठिन सामग्रियाँ होती हैं;इसी वजह से मैंअपनी गृहलक्ष्मी को'तथाकथित पत्नी'कहता हूँ ।लोग कहते हैं, इसलिए 'पत्नी',अन्यथा वह तो हवा की एकख़ुशनुमां...

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